Monday, 23 January 2012

HI DOSTON, ITS A REPRESENTATION OF OUR NORMAL LIFE IN WHICH WE ARE USED TO SEE MANY BAD THINGS, WE KNOW THEY ARE WRONG,WE WANT TO CHANGE THAT, BUT, WE COULD'NT, AND WE HAVE MODIFIED OURSELVES TO LIVE WITH THAT PAIN AND SORROW, WE ALL ARE HELPLESS, BUT THATS NOT THE ANSWER , SO WHAT'S THAT!!!






“मैं मजबूर हूँ”

जब कभी कोई सवाल मेरे सामने आया
जब कभी यूँ ही दुनिया का खयाल आया
तब तब दिल से जाने क्यों
ये जवाब आया – ‘मैं मजबूर हूँ’

जब कभी किसी को अत्याचारों से
चकनाचूर पाया, किसी को
मन ही मन बेबस घुटते पाया
सोचा शायद कुछ कर सकूँ
पर इतना सामर्थ्य नहीं मुझमें
इसीलिये दिल ने कहा ‘मैं मजबूर हूँ’

जब कभी बड़ों को छोटे काम करते देखा
खुद को उठाने को दूजे को गिराते देखा
तब उम्र का लिहाज़, हक़ की बात आयी
और दिल ने कहा, ‘मैं मजबूर हूँ’

अमीरों के पैरों तले रौंदा करती है ज़िन्दगी
एहसान के बोझ तले, दब जाती है ज़िन्दगी
पर गरीब की वो हैसियत कहाँ कि
अवाज़ उठाए, लाचार है वो, और ‘मैं मजबूर हूँ’

             

मंज़िल की राह में
जाने कितने बेसहारा मिले
हमदर्द की तलाश में
भटकते कई गुमराह मिले
सोचा किसी का हाथ थामकर
मंज़िल तक पहुँचा दूँ
पर आगे बढ़ना ज़रूरी है
और इसलिये, ‘मैं मजबूर हूँ’

जब कभी प्यार, बाहें फ़ैलाए मिला
अजनबी दुनिया में कोई दिलदार मिला
सोचा थोड़ा जी लूँ, मैं प्यार बनकर
पर रस्मो रिवाज़ आये सामने, जन्ज़ीर बनकर
प्यार करने का हक़ नहीं मुझे
मैंने फ़िर प्यार से कहा ‘मैं मजबूर हूँ’
 
अब मैं भी मूक बनकर
तमाशा देखता हूँ
लाचार आँखों में छुपी
निराशा देखता हूँ
मदद की गुहार करती
फ़ैलती बाहें देखता हूँ
प्यार पाने को तरसती
मासूम आहें देखता हूँ

मजबूर हैं ये सब
ज़िन्दगी इस तरह बिताने को
क्यों मजबूर हैं हम सब
इन्हें यूँ ही देखे जाने को
मज्बूर है हर ख्वाहिश
दब कर मिट जाने को
मजबूर है हर शख्सियत
मिट्टी में मिल जाने को
 


अब यही खयाल
मेरे सीने में नासूर है
है मुझमें भी जज़्बात
पर ‘मैं मजबूर हूँ’
~ डॉ. पंकज वर्मा।

Sunday, 15 January 2012

HI DOSTON, ITS A PRESENTATION OF DIFFERENCE BETWEEN RICH AND POOR, '' FAANSLA''. IN THIS 'I'(MAIN) REPRESENTS RICH AND 'TUM' REPRESENTS POOR PEOPLE. CONCLUSION IS, WHATEVER WE ARE, AT THE END WE BOTH ARE UNHAPPY


‘फ़ासला’
मुझमें और तुम में ये
फ़ासला क्यों है?
हम एक से हैं पर
फ़िर ये गिला क्यों है?

है मुझमे जुनून ये
जीने का, पर तुझमें
बेबसी लाचारी का ये
सिलसिला सा क्यों है?

हर कदम पर मेरे
साथ है तू हर पल
पर मैं आगे, तू साये सा
पीछे छुपता क्यों है?

है ये मेरी हस्ती
तुझसे ही वफ़ा पाती
पर मैं इतना मगरूर, तू
इतना मजबूर क्यों है?
 
हम दोनों ही अक्सर
हैं भूख से बिलखते,
पर मेरे हाथ में रोटी,
तेरे हाथ में ये पानी क्यों है?



इक दिन दोनों की निगाहें
धुंधली हो जायेंगी
 पर मेरे पास ये चश्मा
तेरे पास ये लाठी क्यों है?

वक़्त की तेज़ धूप
दोनों को ही छकाती हैं
पर तेरे चेहरे पर
ये झुर्रियां सी क्यों है
 
मैं भी इंसा
तू भी इंसा
पर, तेरे पास ही
ये इंसानियत क्यों है


मैं सबकुछ पाकर
खुश नहीं और तू,
कुछ ना पाकर,
आखिर में ये अन्जाम,
ये मुकाम,
एक सा क्यों है?


~ डॉ. पंकज वर्मा।

Friday, 7 October 2011

HI DOSTON, its a representation of a feeling that you have in mind when all the ridiculous orthodox customs and narrow mindedness of people leaves you no choice but to give up what you desire, inspite of knowing the fact that morally you are much of sane mind and what u want is totally truth and descent


इक तड़प है जो जीने नहीं देती,
इक बैचेनी है जो सोने नहीं देती।

बेबुनियाद बेमानी बेनूर सी बंदिशें हैं,
इक बेबसी है जो जुड़ने नहीं देती।

 चमकीली सी दुनिया का, काला सा चेहरा है,
 इक मायूसी है जो हंसने नहीं देती।

शक की कंटीली बेड़ियों से है रिश्ते जड़े,
इक जंज़ीर है जो मिलने नहीं देती।

प्यार की फ़ुलवारी को किसकी नज़र लगी
इक दीमक है जो खिलने नहीं देती।

मानवता के हर कदम पे, ठोकर लग जाती है
इक हैवानियत है, जो चलने नहीं देती।

ऐ ज़िन्दगी! तू प्यार है पर तुझसे एक शिकायत है,
मैं तेरा हूँ, पर तू किसी को मेरा होने नहीं देती।
~डॉ. पंकज वर्मा. 

Tuesday, 20 September 2011

Hi doston, its a representation of a common man' s thinking when he suffers a lot due to his goodness and humanity, still having zeal to win with his holy nature.....SPREAD THE REVOLUTION OF HUMANITY AND LOVE


‘तुम और मैं’

मैं जानता हूँ कि मैं
तुम सा नहीं बन सकता
अपने दिल की बात
तुमसे कह नहीं सकता
क्योंकि है फ़ासले बहुत
जो कम नहीं हो सकते
या शायद कम होना ही नहीं चाहते

छोड़ो अब जाने भी दो
क्यों मुझे बोलने पर
मजबूर करते हो
मैं तो पराया हूँ
मेरा क्या है
तुम तो खुद को भी
खुद से दूर करते हो

आँखें खुली है पर
 देख नहीं सकते
कान हैं मगर
 सुन नहीं सकते
पल पल दूसरे को
गिराने का ही सोचते हो
खुद कितने गिर गये हो
 ये समझ नहीं सकते

एक अजीब सा नशा
तुम पर सवार है
दीवाना सा आलम है
अनजानी पतवार है
कहाँ जा रहे हो, पता नहीं
 और कहते हो
हमसा ना कोई समझदार है

एक दीमक सी लग गयी
है सोच को तुम्हारी
खोखली है असल में
ये हस्ती तुम्हारी

ये खोखली हस्ती
मन्ज़ूर नहीं मुझे
ये तुम्हारी दुर्गती
स्वीकार नहीं मुझे
जानता हूँ, मैं तुम्हारी तरह
शिखर पे नहीं हूँ
संघर्ष तो करता हूँ
पर सफ़ल नहीं हूँ

पर क्या करूँ कि सोच को
अभी दीमक नहीं लगा है
क्या करूँ कि ज़मीर मेरा
अभी सोने नहीं लगा है

नहीं तो मैं भी तुम्हारी तरह
बेहोश हो, बेखबर सा
निकल पड़ता सफ़लता की
अँधी दौड़ में
जहाँ कदम कदम पर मैं
 इन्सानियत को रौंदता
जहाँ मेरा हर कदम
खून से सना होता

नहीं भाई, माफ़ कर दो मुझे
कि इतनी ताकत नहीं मुझमें
कि खुद को ज़िन्दा रखने को
तुम्हें मार दूँ
खुद को आगे बढ़ाने को
इन्सान को पीछे धकेल दूँ

तुम रहो खुश अपने
मुकाम पर कि तुमसे
कोई शिकायत नहीं है
शिकायत खुद से भी नहीं
कम से कम ‘इंसान तो हूँ’

पर भाई जागना होगा तुम्हें
कि ये सही नहीं है
अभी इंसान खोया है
पर सोया नहीं है

ये मत भूलो कि मैं
संघर्ष कर रहा हूँ
जो सब खोये है
उनकी आवाज़ उठा रहा हूँ
कि ये खोखली हस्ती तुम्हारी
कुछ दिनों की मेहमान है
उस सच्चाई का सामना करो
जिसका नाम ‘इंसान’ है

                             जब ये जन संघर्ष
आक्रोश में बदल जायेगा
 तब ये सरफ़रोश हो, तुम्हें
अपने ‘वजूद’ की याद दिलायेगा
और उस दिन भाई
‘तुममें और मुझमें’
कोई फ़र्क नहीं रह जायेगा
~डॉ. पंकज वर्मा.